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Sunday, August 17, 2014

हमारी जिंदगी-एक जीवन दर्पण

मैं जब भी जिंदगी की
कलपनाओं की सच्चाई से जूझती
उन पहलुओं के पृष्ठों को खोलता हूँ
मेरे सामने एक स्पष्ट चित्रो वाली एक मात्र छवि
वो दर्पण-अपने अगले ही पल
एक साथ उन तमाम् किस्से मुझे सुना जाती है
जो आज मेरी जीवन दर्पण बन चुकी है ।

जिसके साथ हमारी
अन्नत कलपनायें घुलमिल रही है
कई अरमान जो एक साथ पनप कर
अपने परवरिस के प्रति दृढ़ सा बना
बार-बार मेरे बहकते कदम को रोकती है ।

इतना सबकुछ तो ठीक है
मगर कबतक हम अपनी वास्तविक दपर्ण को
किसी काल्पनिक रिस्ते के नाम से सजाते रहेंगें
एक दिन वो भी आयेगा जब हमें
उन तमाम अन्नत सीमा रेखाओं को पार कर
अपनी मंजिल तक का फासला-उसकी गहराई
शीघ्र ही इतनी तुच्छ बनाना होगा
जिसे एक तिनके के सहारे मात्र से
पार की जा सके ।

पर फासला कम करने या
दूरी तय करने तक ही सीमित नही है
उससे पहले हमें
कई ऐसे परिस्थितिसे गुजरना है
जहाँ कि खुद को आसान सी रास्तों पर चलने
और कोई दूसरी मंजिल
तरासने पर विवस करेगी
पर हमें हर हाल में
अपने सरल या कठिन रास्तों से जूझ कर ही
अपनी मंजिल को पाना है ।

और शायद यही अंदाज-यही विचार
हमारी वास्तविक जिंदगी से
काल्पनिक जिंदगी के बाद तक रहेगी
तो फिर क्यूँ ना आज से ही
अपने बुलंद इरादों को
उस बुलंदी तक पहूँचाने के लिए सजग हो जायें
जहाँ रात की गहरी और सुनसान अंधियारी में भी
अपना साया
अपनी प्रतिबिंब का वास्तविक एहसास हो ।

इतना ही नहीं जहाँ मधु का काल्पनिक चाँद
अपनी मनोरम दृश्य और मधुरता विखेर
जीवन दर्पन और प्रतिविंव को अपने आप में
इस तरह डुबों लें जिसे देख
सुख की अन्नत सागर सीमायें भी
अपने आप को बहुत सूक्ष्म सा महसूस करे
यही है हमारी जिंदगी की
बिंव-प्रतिबिंव से कहीं दूर
एक स्वच्छ पारदर्शी दर्पण
अर्थात हमारी जिंदगी-एक जीवन दर्पण ।।