झुका दो ये नजरे-
मन मचल जाता है,
थोड़ी मिल जाए
बस दिल बहल जाता हैं ।
है कौन सा वो पत्थर
जो शोलों से पिधल नहीं सकता,
दिल तो फिर भी मोम है-
गर्म सासों से पिधल जाता है ।।
कहाँ तू
आदत ही बना डाली है मुस्काने की,
जबकि इक हँसी-
अपना सराफत भी लूट जाती है ।
फिर कदम- कदम पे
तन्हाई नजर आती है,
तन्हाई एक जाम को
दामन से लगा जाती है ।
जाम हो खाली मगर
फिर भी नशा आता है,
और नशे में सिर्फ तू ही-
बस तू ही नजर आती है ।।
मन मचल जाता है,
थोड़ी मिल जाए
बस दिल बहल जाता हैं ।
है कौन सा वो पत्थर
जो शोलों से पिधल नहीं सकता,
दिल तो फिर भी मोम है-
गर्म सासों से पिधल जाता है ।।
कहाँ तू
आदत ही बना डाली है मुस्काने की,
जबकि इक हँसी-
अपना सराफत भी लूट जाती है ।
फिर कदम- कदम पे
तन्हाई नजर आती है,
तन्हाई एक जाम को
दामन से लगा जाती है ।
जाम हो खाली मगर
फिर भी नशा आता है,
और नशे में सिर्फ तू ही-
बस तू ही नजर आती है ।।