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नन्ही परी

वो नन्ही ममता की प्यासी
कोमलता की तू परिभाषी
कितनी पीड़ा देकर आती
फिर भी आँचल की अभिलाषी

हरे भरे सपनें को सजाती
जिस आँगन में है तू आती
तू है जग के मन की वासी
सुख-दुख है सब तेरी दासी


प्यार है पाना तझको घर से
इस धरती से और अंबर से
आने वाले हर एक पल से
बीत रहे नये इक पल से


सदा बढ़ाती है शीतलता
उन ममता की उन छाया की
धरती माँ की तरह जो तपकर
सारी दुनियाँ को है पलती


तू ही बेटी-तू ही बहना
तू ही माँ के साँचे मे ढ़लती
सच तो है कि इस दुनियाँ में
तू ही हर रिश्ते में ढ़लती ।।