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Monday, November 17, 2014

नन्ही परी

वो नन्ही ममता की प्यासी
कोमलता की तू परिभाषी
कितनी पीड़ा देकर आती
फिर भी आँचल की अभिलाषी

हरे भरे सपनें को सजाती
जिस आँगन में है तू आती
तू है जग के मन की वासी
सुख-दुख है सब तेरी दासी


प्यार है पाना तझको घर से
इस धरती से और अंबर से
आने वाले हर एक पल से
बीत रहे नये इक पल से


सदा बढ़ाती है शीतलता
उन ममता की उन छाया की
धरती माँ की तरह जो तपकर
सारी दुनियाँ को है पलती


तू ही बेटी-तू ही बहना
तू ही माँ के साँचे मे ढ़लती
सच तो है कि इस दुनियाँ में
तू ही हर रिश्ते में ढ़लती ।।