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अपना कौन

लगता है कोई अपना नहीं 
दर्द भरी इस दुनिया में, 
कभी तन्हा बैठा सोंच रहा 
कैसे मग्न हैं सब रंगरेलियों में।

मिला नहीं अंधेरा क्यूँ 
इसलिए उजालों से डरता हूँ,
सपना सा हो गया अपना क्यूँ
इसलिए अपनों से डरता हूँ।

अपना पराया समझ ना सका
जब तक ठोकर खाया न राहों में,
कोई ढूँढा नहीं जब बिछड़ गया
किसी महफिल में बाजारों में।

अब जिंदा रहकर सोंच रहा 
जीना नहीं इस इंतिजार में,
मैं तन्हा हूँ तन्हा रहकर
अब जीना है इस संसार में ।।